सुनता हैं गुरु ज्ञानी : Sunta Hai Guru Gyaani by Saint Kabir Das

 

A philosophical masterpiece by the mystic, saint Kabir das. This bhajan, has been sung beautifully by Pt. Kumar Gandharva
सुनता हैं गुरु ज्ञानी गगन में,
आवाज हो रही झिनी झिनी – (धृ)
 
पाहि लीयाये नाद बिंदु से,
पीछे जमया पानी हो जी
सब घट पूरण बोली रह्या है,
अलख पुरुष निर्बानी हो जी ll 1 ll
 
वहां से आया पता लिखाया,
तृष्णा तौने बुझाई ..
अमृत छोडसो विषय को धावे,
उलटी फाँस फंसानी हो जी ll 2 ll
 
गगन मंडलू में गौ भी आनी
भोई पे दही जमाया…
माखन माखन संतों ने खाया,
छाछ जगत बापरानी हो जी … ll 3 ll
 
बिन धरती एक मंडल दीसे,
बिन सरोवर जूँ पानी रे
गगन मंडलू में होए उजियाला,
बोल गुरु-मुख बानी हो जी ll 4 ll
 
ओऽहं सोऽहं बाजा बाजे,
त्रिकुटी धाम सुहानी रे
इडा पिंगला सुखमन नारी,
सुनत भजन पहरानी हो जी ll 5 ll
 
कहत कबीरा सुनो भई साधो,
जानी अगम के बानी रे..
दिन भर रे जो नज़र भर देखे,
अजर अमर वो निशानी हो जी … ll 6 ll